Tuesday, October 2, 2018

यूँ उस मासूम का मजा़क न करो

यूँ  मासूमियत का खुले आम कत्ल न करो
यूँ उस नन्हें पर अत्याचार न करो
यूँ उस मासूम का मजा़क न करो
यूँ उसे बुरा कहकर बदनाम न करो ।
स्थितियों का मारा है
जग उसे कहता बेचारा है
गुज़र रही है जो उस पर
एकलौता गवाह उसका खुदा है।
यूँ आँखों में चमक लिये
निहार रहा है मन में कुछ कसक लिए
न्योंछावर कर रहा है बचपन अपनों के लिए
और जियेगा भी तो भला किसके लिए ।
बारह की उमर लिए
चल रहा है एक बोझ लिए
सह रहा है सब उस खुशी के लिए
जो बङी मुश्किल से बनी है उसके लिए ।
उम्र से ज्यादा कर्ज में है डूबा
कर्ज से ज्यादा है फर्ज में डूबा
उस फर्ज की खातिर
छोड़ दिया छूना खिलौना ।
यूँ थककर आने पर भी
नहीं झलकती एक शिकंज उस चेहरे पर
क्योंकि उसकी माई बैठी होती है उसे सहलाने तख्त पर
छू हो जाती है यू थकान
जब देखता माँ के चेहरे पर वो मुस्कान ।
यूँ तो उस मासूम को भी है खेलना पसंद
पर किस्मत ने मचाई है हुङ़दंग
माँ कि चिंता करती है उसे तंग
बाप तो चला गया करके जंग।
जंग से तो कभी भला हुआ नहीं
उसकी माँ की चलने की शक्ति रही नहीं
यूँ हिम्मत उसमें आई
खुद ही चल दिया करने चढा़ई।
जग तो करवाने लगा उससे कमाई
क्या कभी जग को शर्म आई??
न कभी जग ने दया दिखाई
और उस मासूम को बना दिया बाल मज़दूर मेरे भाई।
             _रुचि तिवारी

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