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Thursday, June 2, 2022

थैंक्यू KK! हम रहें या न रहें कल, कल याद आएंगे ये पल, प्यार के पल...

KK, 90's के दौर का वो नाम जिसकी आवाज सुन हम सभी बड़े हुए। 'कुछ करने की हो आस-आस... आशाएं' या 'अभी-अभी तो मिले हो, अभी न करो छोड़ने की बात'। दोस्तों के लिए सबसे ज्यादा डेडिकेटड सॉन्ग 'यारों दोस्ती बड़ी ही..' या 'आंखों में तेरी अजब सी अजब सी अदाएं हैं'। 'जिंदगी दो पल की... इंतजार कब तक ...' 'तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकलती रही' 'दिल इबादत कर रहा है',  'जरा सी दिल में दे जगह तू, जरा सा अपना ले बना', 'तू जो मिला, तो हो गया सब हासिल'... कितनी यादें हैं इन गानों के साथ। हजारों दफा गुनगुनाया। मूड ऑफ रहा तो भी KK और मूड मस्त रहा तो भी KK... सच में KK 'हम रहें या न रहें कल, कल याद आएंगे ये पल, प्यार के पल' थैंक्यू! जीवन के सफर को खूबसूरत गानों से सजाने के लिए। 


जिंदगी, आकस्मिक है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। जिंदगी में अपनी आवाज से रंग भरने वाले KK चले गए,  लेकिन ताउम्र हम सब के बीच रहेंगे।

- रुचि तिवारी


Saturday, June 22, 2019

मेरा अस्तित्व ही मेरे पिता की छाया


माय डियर डायरी "पिचकू",
इस शहरीकरण ने सबकी जीवनशैली में न जाने कितने बदलाव ला दिया है। तुम नहीं जानती पर अगर किसी पर असर पड़ा है तो वह रिश्तों में, रिश्तेदारों में, अपनो में।
आज पापा की मौसी घर आई हैं। मैं जब जन्मीं थी तब वह मुझे देखी थी, तब आई थी, घर में फंक्शन हुआ था। तू सोच तब से वो न तो यहाँ आई और न ही हम कभी मिले। अगर मैं सवाल करूँ तो जवाब यह मिलता है कि वक्त ही नहीं था।


आज जब उन्होंने मुझे देखा तो सरपट उनके मुँह से सिर्फ़ यही निकला कि बिल्कुल अपने पापा की तरह दिखती है। उनकी छाया लगती है। मैं एकपल को स्तब्ध रह गई। उनकी बातें सुन थोड़ी देर बाद मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। दादी माँ की बातों पर गौर करने बैठ गई। क्या मैं पापा की छाया हूँ? क्या यह वाकई सच है?
जवाब मिला मुझे ~ हाँ, पर सिर्फ़ शक्ल से ही नहीं। यह मैंने जाना। मेरा वजूद उनसे हैं। सब मुझे मस्त मौला कहते हैं,ऐसे रहना पापा ने ही तो सिखाया था। जब मैं छोटी-छोटी बातों पर फिक्र करने लगती थी तब उन्होंने समझाया था कि परेशान होने से परेशानी और बढ़ती हैं, कोई रास्ता नहीं नज़र आता। यह बात गाँठ बाँध ली थी और नतीजतन ऐसी हूँ। पापा ने ही तो हार न मानना सिखाया था। कहा था कि जब भी लगे बस अब यह काम न हो पायेगा समझ लेना तुम महज़ एक कदम पीछे हो, थोड़ी सी और मेहनत कर लोगी तो मंजिल तक पहुँच जाओगी। पापा ने अगर मुझे मेरी गलतियों पर डाँट नहीं लगाये होते तो आज सही-गलत का फर्क नहीं जानती। अगर मैं अपने दोस्तों के बीच एक बेहतरीन खूबसूरत इंसान की मिसाल हूँ तो सिर्फ़ इसलिए की पापा ने ही समझाया था कि तुम्हें एक बेहद लम्बा सफ़र तय करना है जिंदगी का। यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम खूबसूरती से तय करना चाहती हो या भागमभाग बदहाली से। इंसान की खूबसूरती उसकी शक्ल या रंग से नहीं ज़ाहिर होती है। उसकी आत्मा और मन की पवित्रता से होती है। तुम आज जो भी करोगी उसका रिजल्ट तुम्हें कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी रूप में जरूर मिलेगा।
कमजो़रियों को ताकत बनाना, मेरी ख्वाहिशों को अपनी बनाना, खुद को ताक पर रख मुझे अपनी प्राथमिकता बनाना, मेरी मुस्कान के लिए न जाने कितने अभिनय करना, हज़ारों परिस्थिति में भिन्न-भिन्न किरदार निभाना। बहुत कुछ उन्हें देख, जान और समझकर सीखा है मैंने।
आज मैं जो भी हूँ, मेरे वजूद का कारण मेरे पापा का तप, त्याग, स्नेह और भरोसे का परिणाम है। मेरा अस्तित्व ही मेरे  पिता की छाया है।
_रुचि तिवारी

Thursday, June 13, 2019

जौहरी बनिये



डियर पैरेंट्स,
मैं आज आपसे अपनी मन की बात कहना चाहता हूँ। वह बात जो मैं और मेरे जैसे न जाने कितने बच्चे अपने माता पिता से नहीं कह पाते। आप सबको सिर्फ़ होटल या दुकान में छोटे-छोटे बच्चे जो काम करते हैं वह शोषित नज़र आते हैं। इसमें ज़रा-सा भी कोई संदेह नहीं है। हाँ वे हैं। आप हमें भाग्यशाली बताते हैं क्योंकि हम सुख सुविधाओं के उपभोगी हैं। परंतु आप भी जाने अनजाने हमारा शोषण करते हैं। हाँ, मुझे यह कहने में बिल्कुल भी असहज महसूस नहीं हो रहा। आप हमारी एक दूजे से तुलना करते हैं। शर्माजी की बेटा हमेशा अव्वल आता है, तुम क्यों पीछे रह जाते हो? फलां बच्चा कितना होनहार हैं, पढ़ाई में होशियार है।
इस बार तुम्हें 99% लाना ही है, तुम्हें इंजीनियर (डाॅक्टर, आदि) ही बनना है। क्यों ? क्योंकि शुक्ला जी का बेटा भी वही है।
आखिर क्यों? क्यों 99% ही? क्यों डाॅक्टर, इंजीनियर आदि ही? क्यों आप हम पर दबाव बनाते हैं? कम नम्बर आने पर ताने देते हैं? आखिर यह बात क्यों नहीं समझते कि हर किसी की अपनी खूबी और काबलियत होती है। हर किसी का मानसिक स्तर एक सा नहीं होता। सबकी रुचि अलग-अलग होती है।
मेरी आपसे और सभी उन मात पिता से दरख्वास्त है कि प्लीज़! हमें समझें। हमपर दबाव न बनाएँ। हमारा मानसिक शोषण न करें। सही राह पर लाना, अच्छे संस्कारों से सुसज्जित करना कर्तव्य है पर एक खुली मानसिकता और वातावरण प्रदान करना भी कर्तव्य ही है। एक बार हमसे हमारी सुनकर तो देखिए। हमारा निरिक्षण तो किजिए। कभी हम पर, हमारे कृत्यों पर गौर तो करिए। तब तो आप हमें बखूबी समझ पाएँगे और हमारा उज्जवल भविष्य निर्धारित कर सकेंगे। अगर हम आपके हीरे हैं तो आप भी हमारे जौहरी बनिये न।
आशा हैं मेरे मनोभावों को आप समझ सकेंगे।
आपका प्यारा "बेटू"                                                     ......................

                                           लेखिका _रुचि तिवारी 

Tuesday, May 14, 2019

अगर नया जन्म लूँ ....

माय डियर डायरी " पिचकू " ,

मैं तुमसे रोज़ाना इतना कुछ कह जाती हूँ यह मुझे तब पता चलता  है जब तुम्हारे सभी पन्ने भर जाने वाले होते हैं वो भी कैसे , सिर्फ़ मेरी बातें सुनते सुनते और फिर तुम्हारा हो जाता है नया जन्म !!! मैं नई डायरी जो खरीद लाती हूँ । तुम न बहुत भाग्यशाली हो जो तुम्हारा बारम्बार पुनर्जन्म हो जाता है वो भी एक ही जगह , एक ही घर में और तो मेरे ही पास मेरी  साथी बन जाती हो । कभी-कभी सोचती हूँ " मैं फिर से पैदा होती तो ? " हाँ , जानती हूँ की यह असंभव है , तुम इतना हँसो मत पर एक बार गौर तो कर ! तुम हर दफा अपने हर नए जन्म में मेरे ही पास आती हो , तुम्हें भी मुझसे काफी शिकायतें होंगी । आखिर तुम मेरी ही तो सुनती हो कभी अपनी नहीं कह पाती ।  पर आज मैं तुमसे साझा करती हूँ कि मुझे क्या शिकायतें हैं और अगर मैं फिर से जन्म लूँ तो कहाँ जन्मूँ ।
 एक ऐसे परिवार में मेरा जन्म हो जहाँ सुकून से सभी रहें , एक दूजे से हँसे बोले , आपस में स्नेह तो हो पर एक दूसरे के लिए समय भी हो । विचारों में बाध्यता न हो न हीं विचार एकल पहलू हो । बदलाव को अपनाया जाता हो और तो और विश्वास की परत भी हो । रिश्तों का नाम लेकर कार्यों में बंधन न हो ,  पंरपराओं और संस्कारों संग आधुनिकता का मिश्रण भी हो । कार्यों को थोपने के बजाए जिम्मेदारी का एहसास हो , टेक्नोलॉजी सिर्फ़ आॅफिस में और घर में प्यार दुलार हो । संबंध मधुर हों मीठी-मीठी तकरार हो । कर्तव्यों के लिए मजबूर करने के बजाय उनकी महत्ता को समझाया जाए । भावों को नहीं जरुरतों को पहले देखा जाए । विचारों में खुलापन और मन में नएपन को अपनाने की ललक हो । कुछ कर गुजरने से पहले ही फैसले की सुनवाई न हो जाए । पौराणिक तरिकों में बदलाव कर एक बार नए को कर देखने में हर्ज कैसा ???
 हाँ , मुझे परिवार में बदलाव चाहिए क्योंकि मैंनें बचपन से सुना है पहले शिक्षक माता पिता होते हैं और पहला विद्यालय परिवार \ घर होता है । पहले मेरा घर बदलेगा कल शायद यह बदलाव किसी और को भी वाजिब लगे और परसों किसी और को । जब  परिवार सहायक होगा तो समाज होगा क्योंकि समाज भी तो परिवार है । एक एक परिवार के मिलने से समाज बनता है और समाज में हम रहते हैं । कई दफा मैंनें  देखा है मनचाहा काम नहीं करने मिलता क्यों ? क्योंकि  समाज क्या कहेगा । जब परिवार में बदलाव आएगा स्वाभाविक है समाज में आएगा । हम यह तो सोच लेते हैं कि समाज क्या कहेगा पर यह भूल जाते हैं समाज हमसे बना है। हाँ ! मुझे बदलाव चाहिए क्योंकि मैंने यह भी सुना था  " वसुधैव कुटुम्बकम " !!!!
चलो मेरी शिकायतों का पिटारा बंद करती हूँ और सो जाती हूँ    पिचकू तू भी आराम कर।

तेरी साथी
रुचि तिवारी ।

Thursday, May 2, 2019

मैं मजदूर हूँ !!!



नमस्ते !

आज मैं अपनी कुछ बातें आप के साथ साझा करना चाहता हूँ इसलिए यह खुला पत्र आप सबके लिए ।

आशा है आप सब मंगलमय होंगे एवं गर्मी में कूलर , शीतल पेय और फलों का मज़ा ले रहे होंगे ।

मुझे देख मुझसे दूर क्यों हो जाते हैं आप सब ?
मेरी कभी क्यों नहीं सुनते ? 
हमेशा मैं ही क्यों सुनता हूँ आपकी ? 
थोड़ी अजब-गजब लगें शायद मेरी यह बात आपको पर जताने की बड़ी तमन्ना है । मेरे लिबास से ही आप सब मुझे पहचान जाते हैं कि मैं मजदूर हूँ । दिन-रात  , धूप छांव , सर्दी- गर्मी कैसे भी हालात हो बिना  किसी बहाने के काम मैं  करता हूँ । वो गद्दी वाली कुर्सी पर बैठे साहब और मेम लोग बस हुकूम करती हैं और मुझे काम करना होता है । कभी किसी ऊँची बिल्डिंग में , कभी सड़कों में , कभी खेतों में , कभी माल ढोने में , कभी होर्डिंग लगाने में आदि आदि । मेरा कोई ठौर ठिकाना नहीं । कभी रेत के ढेर पर मिलूंँगा तो कभी मालगोदामों में , कभी धूल के आशियाने में तो कभी सूरज की कड़कड़ाती चमक में खेलता हुआ और हाँ ! शायद कभी ठेला ठेलते या रिक्शा खींचते । मुझे तो बड़ी आसानी से मजदूर बोलते हैं आप पर क्या कभी गौर किया की ये मेरा नहीं , मजदूर शब्द का नहीं अपितु कार्य का उपहास है ।  वो भी उस कार्य का जो या तो आप नहीं करना चाहते या असमर्थ है  ।  यहाँ तक की आप हमारे कारण ही आराम फरमा पा रहे हैं ।

एक निवेदन है आप कार्यों का उपहास न करें और न ही मानव योनि का । हाँ ! मैं मजदूर हूँ पर मजबूर नहीं । मेहनत मेरी क्षमता मेरा गुरुर हैं । क्योंकि मैं वह काम करने में पीछे नहीं हटता जिससे आप सब हटते हैं । ज्यादा नहीं पर आपसे मैं यह अपेक्षा तो रख ही सकता हूँ की मुझे भी मानव ही समझे । 

धन्यवाद !
हमेशा काम आने वाला ,
आपका तिरस्कृत " मजदूर "

लेखिका _ रुचि तिवारी 

Tuesday, April 23, 2019

स्वीप में बाल कलाकारों का कमाल !!!

" काय बिन्ना ! वोट डारवे जेहो की नयी ? .... काय तुम्हें पता नइया वोट डारवो कित्तो जरूरी है ? ..... जे लेओ कर लेओ बात ! तुम तो पढी़ लिखी मेमसाब हो फिर भी देश लाजे अपनी जिम्मेदारी से जी चुरा रयी हो ! ...... हम तो भज्जा अपनो सारो काम काज बाद में करहें , सबसे पहले वोट डाल के आहें ..... " 
अरे अरे अरे !!!!! इसे पढ़कर अचंभित मत होइये ।  मैं  यहाँ  आपको  "मत्तो बाई " के  बुंदेलखंडी बोली  के  चुलबुले पर एक दम सटीक डाॅयलागों से रूबरू करवा रही हूँ ।  अब आप सोच रहे होंगे की मत्तो बाई कौन सी  अभिनेत्रि है ??? तो आगे बढ़ते बढ़ते पूरी कथा वाचन करती हूँ.....
मतदाता जागरुकता अभियान और स्वीप (सिस्टिमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलै्कटोरल पार्टिसिपेशन) के कार्यकमों का मुख्य किरदार है " मत्तो बाई " । जिसने इस जिम्मेदारी ली है जन जन को मतदान के लिए जागरूक करने की ।

मत्तो बाई और कोई नहीं बल्कि संभागीय बाल भवन की बाल अभिनय कलाकार है । संभागीय बाल भवन स्वीप , मतदाता जागरूकता अभियान का पार्टनर है और यह एक नई पहल है जब बाल कलाकारों / नाबालिगों को ऐसे कार्यक्रमों में जोड़ा गया है । हैरतअंगेज बात यह है कि इनको इस जिम्मेदारी के विषय में ज्यादा ज्ञान न होने के बावजूद अपने-आप को किसी से कम नहीं समझते और तो और जब अधिकारियों की चुनाव ड्यूटी लगने पर जहाँ वो काम को देख मुँह बिचकाते हैं वहीं ये उर्जावान कलाकार अपने गुरूजनों से अगले कार्यक्रम की तारीख पूछते नहीं थकते ।

मत्तो बाई की टेर ......
मत्तो बाई का किरदार निभा रहीं पलक गुप्ता महज अभी पंद्रह वर्ष की है और बहुत ही अच्छी बाल अभिनय कलाकार है । जब उनसे पूँछा गया कि वो अपने इस किरदार में खुश हैं या नहीं तो उन्होंने बताया कि जब उन्हें मत्तो बाई का किरदार निभाने कहा गया तो नाम सुनकर अजीब लगा क्योंकि किरदार के उद्देश्य के बारे में नहीं बताया गया था पर जैसै ही पता चला वो तुरंत राजी हो गई । पहल पहल ज्यादा तो नहीं पता था पर खुशियों का अंबार तब लगा जब पता चला कि बहुत सारे बच्चों में से मुझे चुना गया है और मेरी पर्फारमेंस सभी को बहुत पसंद आ रही है और लगातार सराहना मिल रही है । और छोटी सी उम्र से ही सहभागिता का मौका मिला । मत्तो बाई अपने हमउम्र साथियों से ये अपील करना चाहती हैं की हम स्कूल में सिविक्स (नागरिक शास्त्र ) एक विषय के तौर पर परिक्षाओं में पास होने के लिए सिर्फ़ न पढे़ उससे अपने अधिकारों , कर्तव्यों के प्रति खुद तो सजग हो हीं साथ ही साथ बडो़ को भी करें ।


" बूथ तलक तुम जाना ...... मतदान करके आना ..... अपना फर्ज़ निभाना ..... मतदान करके आना ......" 
ये डायलाॅग नहीं है अपितु गाने के बोल हैं । पंद्रह वर्षीय बाल कवियित्री उन्नति तिवारी  के जो कि अपनी स्वरचित कविताओं और गीतों के माध्यम से जनता को जागरूक कर रही हैं । जब उनसे पूँछा गया कि वो क्या अपनी कोशिशों में कामयाब हो पा रही हैं तो उन्होंने बताया की बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं । आज के दौर में जहाँ फिल्मी गानों का चलन अत्यधिक है वहाँ पर भी हर आयुवर्ग मेरे गीत सुन रहा है , प्रभावित हो रहा है और प्रशंसा भी कर रहा है । जब मेरी गुरुमाँ ने गीत लिखने कहा तो मैं थोड़ी असहज हुई पर चुनावी माहौल था और कुछ दिन पहले ही विधानसभा चुनाव हुए थे तो उस माहौल की यादें भी ज़हन में थी इसलिए काफ़ी अच्छा कर पाई ।  बाल कवियित्री ये अपील करना चाहती हैं की शत् प्रतिशत मतदान से ही देश का विकास होगा इसलिए मतदान अवश्य करें । अपनी जिम्मेदारी निभाएं।

गुरु शिष्य परंपरा का है निर्वहन
संभागीय बाल भवन संचालक श्री गिरिश बिल्लौरे जी ने बताया कि आज भी बाल भवन में गुरु शिष्य परंपरा ही चलती है । और हमारे इन बाल कलाकारों की नींव हैं बच्चों की गुरुमाँ  डाॅ रेणु पान्डे एवं शिप्रा सुल्लेरे जी , जो निरंतर बच्चों की पाॅलिशिंग कर उन्हें निखार रही हैं । और हर कार्यक्रम में रचनात्मकता की ऊँचाइयों के शिखर पर जाकर एकदम नया मसालेदार फ्लेवर नागरिकों के समक्ष प्रस्तुत करने पेश कर रही हैं ।

बाल भवन संचालक बताते हैं कि मूलतः हर कार्यक्रम में स्टैंडर्ड भाषा ली जाती है जिस कारण समाज के कुछ वर्ग नहीं जुड़ पाते हैं इसलिए हमारी बोली बुंदेलखंडी फ्लेवर को भी इस बार समाहित किया जिससे मनोरंजन भी हो , हर वर्ग तक बात भी पहुँचे , जो चीजें छूट रहीं हैं (हमारी बोली के प्रति स्नेह) , और एक बंधे बंधाएं फार्मेट से निकल कुछ नई पहल करें ।


इन बाल कलाकारों के लिए बस यही शब्द हैं :
छोटे पैकेट बडे़ धमाल .....
स्वीप में बाल कलाकारों का कमाल !!!!

लेखिका _ रुचि तिवारी 
Ground reporting : रुचि तिवारी , वृष्टि नारद , साकेत सिंह , कशिश पारवानी । 





Sunday, April 21, 2019

देश के महात्योहार के लिए दौड़ा पूरा शहर

ढलते सूरज और निकलते हुए चाँद की लालिमा के बीच जैसे ही शहर की सड़कें रंग बिरंगी लाडट्स जली और शहरवासियों नें रंग बिरंगी टि शर्टस् में दौड़ लगाई शहर का नज़ारा देखते ही बना । मौका था जबलपुर शनिवार 20 अप्रैल 2019  शाम 7 बजे से  हुई  " नियाॅन रन _ रन फाॅर डमोक्रेसी " रेस का । जिसमें शहरवासियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया । शहर के इतिहास में शायद पहली बार ऐसी रेस का आयोजन किया गया जो कि शाम को हुई और बहुत ही मनोरंजक एवं रचनात्मक शैली में संपन्न हुई ।
' नियाॅन रन _रन फाॅर डेमोक्रेसी ' का आईडिया शहर के  निगमायुक्त जी ने पेश किया चूँकि गर्मी का मौसम होने के कारण धूप हो जाती है एवं आॅफिशियल वर्कर्स तथा स्कूल काॅलेज स्टूडेंटस् की टाईमिंग भी मिसमैच हो जाती है इसलिए शहर में शाम के समय रेस का " ईवनिंग कार्निवाल " के रूप में आयोजन किया गया ।



पूरे 5 किलोमीटर की इस रेस में दस स्टाॅपस् बनाए गए थे जहाँ लोगों को डी जे राॅक म्युजिक एवं विभिन्न मनोरंजक प्रस्तुतियों का लाभ मिला। शहर की सड़कों पर लगी जगमग रंग बिरंगी लाईटों नें  सड़कों की चमक
में चार चाँद लगाई । विभिन्न काॅलेज के स्टूडेंटस् एवं कई कलाकारों ने जहाँ मनोरंजक प्रस्तुतियां दी वहीं बाल भवन के बच्चों एवं मत्तो बाई ने मतदान के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाई । कलाकारों द्वारा फिल्मीं गानों , रचनात्मक प्रस्तुतियों एवं डी जे के हाई वाल्यूम ने शहरवासियों की ऊर्जाशक्ति दोगुनी की ।
सुहानी शाम में जब कलरफुल शर्टस् के साथ सबको रेडियम बैंड्स दिए गए  , तो चमचमाते बैंड्स से सबके चेहरे भी चमक उठे और शाम और मस्तानी हो गई ।  शहरवासियों को उनके " राईट टू वोट " के प्रति जागरूक करने के लिए इस रेस में शहर के हर वर्ग एवं हर उम्र के लोगों नें बढ़ चढ़कर न केवल सिर्फ़ हिस्सा  लिया बल्कि प्रशासन की तारीफ़ भी की । जबलपुर के महाविद्यालयों में बाहर से आए जो विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं और शहर में ही निवास कर रहे हैं उन्होंने भी अपना उत्साह दिखाते हुए भाग लिया और मतदान की शपथ भी ग्रहण की । एक नयापन एवं रचनात्मक पहल  जहाँ लोगों के मोहा  वहीं सुव्यवस्था ने भी सबको आकर्षित किया क्योंकि जगह जगह पर बने स्टाॅपस् पर पानी की बाॅटलें , फर्स्ट एड हैल्प की सुविधा भी मुहैया कराई गई थी । रेस को कम्पलीट करने के बाद में मिले   रफ़्रिश्मन्ट से  बच्चे कुछ ज्यादा ही खुश नज़र आए ।
शहर में ऐसा समागम जहाँ हर आयु वर्ग सम्मिलित हुआ एक काबिल ए तारीफ़ पहल थी । स्वीप ( सिस्टिमैटिक वोटरस् ऐजुकेशन एंड ईलै्कटोरल पार्टिसिपेशन ) , नगर निगम एवं जबलपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड की सुव्यवस्था , मनोरंजन एवं जागरूकता के रचनात्मक प्रयास के लिए वाह वाही तो बनती है । शहरवासियों को मतदान की शपथ दिलाकर ही रेस को हरी झंडी दिखाई गई थी और मैं भी आप सबसे यह अपील करना चाहती हूँ कि अपना दायित्व  जरूर निभाएं  , वोट करने जरूर जाएं ।  देश के इस महात्योहार को मनाएं , मतदान करके अवश्य आएं ।
लेखिका   _  रुचि तिवारी
Ground Reporting : रुचि तिवारी , वृष्टि नारद , साकेत सिंह । 

Wednesday, February 20, 2019

Farewell speech


Teacher : I am very happy while announcing that you guys are going to have your farewell party next week. Best wishes to you all .

After the announcement the whole class just started  flying in air with the seven colors except me. The discussions started among the batchmates but a great decision debate was going-on  inside me . When  everyone was on busy in  making decisions I was busy in fighting with my aspirations and the fears. In spite of being happy for beginning of new chapter of life I was scaring with the new glittering lights.
My inner voice was saying 15 years you were here....Your second home...Your family having teacher's as mother ~ father, friends as brother ~sister, guider ,motivator , how will you able to leave them all ....
How will you live without the unknown persons as now after school you have to go out for higher studies. The world which is full of frauds will be you able to survive ? And many more such kind of thoughts while the other side of my inside the inner  voice was holding my hand giving relief and was saying only few days are left, let's make the memories so hard that can't never be forgot.  Now, the time has came when you have to start a new chapter of life where you will not only live but learn how to survive , how to adjust , how to prove yourself ,  now the time has came when you have to put your all efforts in showing that     " you are ".  "What you are among this crowd " ?

I heard this side of my soul and just started preparing for my first farewell with my second family.

If today I m on the stage in front of all of you so just because of my souls that voice which encouraged me . Yes , its true that my other side voice realised me to recognize me that what you all are for me but that side was holding me to stop here which you all my lovely teachers had not ever teach me... My dear friends whom always pushed me in every activity , whether in the field of academic or cultural , whether it was project or practical , whether it was sorrow or enjoyment you all encouraged me ever.
I am unable to say thank or greet anyone but I really say that I m going to miss all these memories everyday , every minute when I will trying to make new friends at college , when I   am going to arguing with teachers , when I will make any assignments or going on any hangout whatever I will do just going to remember you all every second.

The great applause just heard and my eyes with almost everyone was wet and when I all this completed unable to understand that literally was that I  And had depicted my condition after the announcement . I left the stage and came down getting lots of blessing from teachers and friends .

Ruchi Tiwari

Thursday, January 10, 2019

विश्व हिंदी दिवस

आज का दिन एक विशेष दिवस के रूप में भारत के साथ-साथ पूरे विश्व में मनाया जा रहा हैं । और यह दिवस कोई साधारण दिवस नहीं अपितु एक भाषाई दिवस है , " विश्व हिंदी दिवस " है।
हिंदी एक ऐसी भाषा है जो समुंदर है और जिसमें न जानें कितनी छोटी बडी़ नदियाँ (भाषाएँ, बोलियाँ) आकर समाहित होती जा रहीं हैं और हिंदी उन्हें सहृदय स्वीकार भी कर रही हैं ।
हिंदी का विशाल हृदय सबको पल भर में अपना बना लेता है और इस तरह अनेक भाषा बोली उसमें घुल मिल जाती हैं कि परायापन समझ ही नहीं आता ।
              क्यों मनाते हैं दिवस ?
प्रायः हम सभी दिवस तो मना लेते हैं पर हमें यह नहीं पता होता की हमने यह विशेष दिवस मनाया क्यों या उस विषय पर विशेष दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
दुनिया में हिंदी के व्यापक प्रचार के लिए 10 जनवरी 1975 को नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन हुआ । और फिर सिलसिला निरंतर चला । साल 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाए जाने की घोषणा की और तब से हिंदी के प्रचार हेतु हर वर्ष मनाया जाने लगा ।
                   हिंदी का प्रभाव :
हिंदी का वैश्विक स्तर पर काफी प्रभाव हुआ है ।
»     एक तरफ़ जहाँ पहले मोबाइल कीबोर्ड  में केवल अंग्रेज़ी फौंट उपलब्ध रहते थे वहाँ हिंदी को स्थान मिला ।
»    इंटरनेट पर कंटेंट और इंफाॅरमेशन जहाँ हिंदी भाषा  में नहीं मिलती थी वहाँ अन्य भाषाओं के साथ-साथ हिंदी को प्राथमिकता दी गई  ।
»    सभी सर्च ईंजनस् पर हिंदी टाईपिंग एवं वाॅइस कमांड दोनों तरीकों से सर्च करने की प्रक्रिया ने हिंदी के महत्व को दर्शाया।
»     विभिन्न वेबसाइटों पर मौजूद हिंदी साहित्य , लेख, आलेख, कविता ,गज़ल ,मुक्तक , ब्लाॅग , रचनाओं ने हिंदी का अलग स्थान दर्ज किया ।
»     अब आॅनलाईन न सिर्फ़ अंग्रेज़ी माध्यम की किताबें मिल रहीं हैं वरन् हिंदी के उपन्यास , कहानी-संग्रह और किताबों का अंबार एवं PDF फाॅरमेट भी मौजूद है ।
»   सोशल साईटों पर हिंदी स्टेट्स एवं पोस्टों का बढ़ता रूझान ।
»   अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को पढ़ने-लिखने और बोलने सीखने का ग्राॅफ बढा़।
हिंदी की सर्वसमाहित करने की प्रवृत्ति ने कहीं-न-कहीं हिंदी को प्रदूषित कर दिया है। एक ओर जहाँ साहित्यिक भाषा से दूरी होती जा रही है वहीं दूसरी ओर गलत उच्चारण और मात्राओं के अज्ञान को बढा़वा मिल रहा हैं । हिंदी को प्रदूषण से मुक्त कराने हम सभी को अपने-अपने स्तर पर कई छोटे-बड़े प्रयास करने होंगें ।
                                               _रुचि तिवारी
               

Sunday, January 6, 2019

नए चैप्टर के असाइनमेंट ...

टीचर (जिंदगी) ने हमारी बुक का नया चैप्टर (साल) शुरू कर दिया है । उस चैप्टर (साल) का पहला टाॅपिक (जनवरी) चल रहा है। टीचर (जिंदगी) ने बहुत कुछ बताया है इस चैप्टर में करने को ।  उन्होंने समझाया इस चैप्टर (साल) में 12 टाॅपिक (महीने)और 365 सब~ टाॅपिक (दिन) हैं । हर एक सब~टाॅपिक (दिन) तुम्हें हर रोज़ कोई न कोई नया ज्ञान देगा ।  तुम्हारे सभी टाॅपिक तुम्हें चुनौतियां देंगे खुद को साबित करने की । और तुम सबको अपने वजूद का निर्माण इन्ही टाॅपिक एवं सब~टाॅपिक से मिली सीख से करना होगा। स्टूडेंट्स (लोगों) ने कई सारे असाइनमेंट (रेजोल्यूशन) के बारें में समझकर अपने चैप्टर (साल) को मनोहारी एवं टीचर (जिंदगी) को इम्प्रेस करने की ठान ली हैं ।
जो स्टूडेंट्स (लोग) पिछले चैप्टर में किसी कारण से अपने असाइनमेंट (रेजोल्यूशन) में पिछड़ गए थे या ज्यादा नंबर (सुख~सुविधा) नहीं ले पाए थे , इस बार पूर्णतः फोकस कर रहें है ज्यादा से ज्यादा नंबर पाने और क्लास (दुनिया) के इतने सारे स्टूडेंट्स (लोगों) के बीच में फिर से न पिछड़ने की ।
रेजोल्यूशन (असाइनमेंट)तो स्टूडेंट्स(लोगों) ने लिए पर टीचर (जिंदगी) जो इस चैप्टर(साल) में इतनी सारी चुनौतियां देने वाली हैं उन चुनौतियों से सामना करते हुए कब तक असाइनमेंट पूरा करेंगे या खुद को बदल लेंगें ये तो नया चैप्टर(साल) बताएगा ।

Tuesday, November 6, 2018

आज नहीं ' अभी ' में जीते हैं

दृश्य 1 : एक जनरल किराना स्टोर , यूँ तो मैं भाई के साथ खड़ी थी और गोलू के खटाखट सामान निकलने की तरकीब गौर कर रही थी तभी वहाँ 3 साल की रूही आई । रूही को मैं जानती नहीं थी । वह अपने दादा जी के साथ आई थी। हम भी खरीददारी कर ही रहे थे । रूही की पायल की छनक ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा । सफेद रंग की प्यारी-सी फ्रॉक में वह खिलखिलाता हुआ चेहरा और चमकदार बदन में वह किसी असली परी को हराकर अपना ही नूर बरसा रही थी । दुकान में प्रवेश उसने जिस खिलखिलाहट से थी उससे तो वहाँ का पूरा समां ही बंध गया था। दादा जी भी सामान की पर्ची गोलू को थमा स्नैक्स काॅर्नर गये और वहाँ पर रूही के बोलते ही " बब्बा ये वाला ये वाला " करते वो सारे पैकेट उठाते गये जबतक रूही ने चुप होकर राहत भरी साँस नहीं ले ली । तब तक गोलू भी दादा जी का पूरा सामान लगभग पैक कर ही चुका था ।   वो सारे पैकेट्स गोलू को दिए और अलग बैग में रखने को कहा । वह अलग बैग उन्होंने रूही को पकड़ाया । बैग पकड़ते ही रूही के चेहरे की चमक संग उसने जो चाल चलनी शुरू की उसे देख ऐसा लग रहा था मानों रुही को वह पूर्ण संतुष्टी मिल गई हो जो उसे जीवन में चाहिये थी। बैग में इतना कुछ भी नहीं था कि उसे वह दो से तीन दिन तक रख सके । सिर्फ़ चिप्स के तीन या चार पैकेट जिन्हे वह चंद घंटों या ज्यादा से ज्यादा शाम तक में  खत्म कर सकती है ।
दृश्य 2 : मार्केट से वापस लौटने पर घर के पास ही रह रहे 6 वर्षीय सुबोध पर नज़र गई । उसके घर की पुताई का अंतिम ही चरण चल रहा था आज । पुताई वाले अंकल लकड़ी की सीढ़ी पर चढ़े पुताई कर रहे थे। सीढ़ी में नीचे तरफ़ जूट की उलझी हुई-सी रस्सी उसी में बंधी हुई फैली थी जिसमें अचानक वहाँ से आते-जाते कोई भी फँसकर गिर सकता था । सुबोध के पास वैसे तो खिलौने का अंबार है। कोई उसके खिलौने छू भी नही सकता । हाँ , आरती , स्नेहा , परी, आरु , क्षति और शुभ के साथ खेलते वक्त थोडा़ बाँट लेगा पर अगर कभी बिना साहब के मूड के छू लो तो खैरियत खुद की मनानी पड़ती है। खैर , आज सुबोध उन खिलौनों की दुनिया से दूर उस रस्सी को सुलझा रहा था जो किसी "  पज़ल " से कम नहीं  थी। ऊपर बालकनी से आंटी उसे चिल्ला चिल्लाकर मना कर रहीं थी पर वह तो " अभी " में जी रहा था । " अभी " उसके पास खेलने सिर्फ़ वह रस्सी थी । उसने यह नहीं सोचा कि सिर्फ़ आज तक ही उस रस्सी और सीढ़ी का उसके साथ साथ है । इस समय उसे सिर्फ़ वह रस्सी सुलझाना था जो उसके सामने थी मानों जैसे की उसके जीवन का लक्ष्य सिर्फ़ पूर्ण करके हासिल होगा।
             कितनी अनोखी होती है इन मासूमों की दुनिया । न तो कल किससे खेले थे उसकी सुध और न तो कल किससे खेलना है उसकी चिंता । आज क्या करना है क्या नहीं न तो कोई शैड्यूल और न ही टाइम मैनेज कर मीटिंग फिक्स करना ।
         जीना है तो बस उस पल में जो अभी है। क्या है , क्या नहीं है , क्या होना चाहिये कुछ नहीं । जो सामने है बस वही दुनिया है । वह खुद को उस ढाँचे में डाल तुरंत तबदील हो जाते है । हर स्थिति में माकूल हो जाते है। दुनियादारी से परे अपनी दुनिया बसाते है जो सपनों की नहीं हकीकत की होती है , किसी दूसरे लम्हों की नही उसी वक्त की होती है जिसमें वह जी रहे होते है।
सुनते तो हम भी हैं अक्सर कल में नहीं आज में जियो पर फिक्र तो कल की ही सताती है । ये मासूम जिनको आज और कल में फर्क तक नहीं पता वो तो हम सबकी सोच से परे  " अभी " में  जीते हैं।

  •                                                 _ रूचि तिवारी

Sunday, November 4, 2018

फर्क प्राइस टैग का !!!

१ नवंबर को रचनाकार " सुरेश कुशवाहा ' तन्मय ' " जी कि " मानसिकता " नामक लघुकथा पढ़ी । उनकी रचना ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या अब हम वही भारतीय रह गये हैं जिनके लिए देश की माटी , देश के किसान , हमारे स्वदेशी उत्पाद सर्वोपरि थे ? या कहीं बहुत कुछ खो सा गया है ? आप सभी के साथ वह लघुकथा और अपने विचार साझा करने का विचार की और दो दिन बाद सुरेश सर के संपर्क में आकर अपने ब्लाग पर पब्लिश करने की अनुमति ली। खैर , दिवाली को लेकर चल रही तैयारियों की व्यस्तता के चलते थोड़ी देर से आपके समक्ष ला रहीं हूँ ।
लघुकथा इस प्रकार है ~
                         " मानसिकता  "
दीपावली से दो दिन पहले खरीदारी के लिए वो सबसे पहले पटाखा बाजार पहुंचा। अपने एक परिचित की दुकान से चौगुनी कीमत पर एक हजार के पटाखे खरीदे।
फिर वह शॉपिंग सेंटर पहुंचा, यहां मिठाई की सबसे बड़ी दुकान पर जाकर डिब्बे सहित तौली गई हजार रूपये की मिठाई झोले में डाली।
इसके बाद पूजा प्रसाद के लिए लाई-बताशे, फल-फूल और रंगोली आदि खरीदकर शरीर में आई थकान मिटाने के लिए पास के कॉफी हाउस में चला गया।
कुछ देर बाद कॉफी के चालीस रूपये के साथ अलग से बैरे की टीप के दस रूपये प्लेट में रखते हुए बाहर आया और मिट्टी के दीयों की दुकान की ओर बढ़ गया।
“ क्या भाव से दे रहे हो यह दीये ? ”
“ आईये बाबूजी, ले लीजिये, दस रूपये के छह दे रहे हैं ”
“ अरे!  इतने महंगे दीये, जरा ढंग से लगाओ, मिट्टी के दीयों की इतनी कीमत ? ”
“ बाबूजी, बिल्कुल वाजिब दाम में दे रहे हैं। देखो तो, शहर के विस्तार के साथ इनको बनाने की मिट्टी भी आसपास मुश्किल से मिल पाती है। फिर इन्हें बनाने सुखाने में कितनी झंझट है। वैसे भी मोमबत्तियों और बिजली की लड़ियों के चलते आप जैसे अब कम ही लोग दीये खरीदते हैं। ”
“ अच्छा ऐसा करो, दस रूपये के आठ लगा लो ”,
दुकानदार कुछ जवाब दे पाता इससे पहले ही वह पास की दुकान पर चला गया। वहां भी बात नहीं बनी। आखिर तीन चार जगह घूमने के बाद एक दुकान पर मन मुताबिक भाव तय कर वह अपने हाथ से छांट-छांट कर दीये रखने लगा।
“ ये दीये छोटे बड़े क्यों हैं? एक साइज में होना चाहिए सारे दीये ”
“ बाबूजी, ये दीये हम हाथों से बनाते हैं, इनके कोई सांचे नहीं होते इसलिए.... ”
घर जाकर पत्नी के हाथ में सामान का झोला थमाते हुए वह कह रहा था –
“ ये महंगाई पता नहीं कहा जा कर दम लेगी। अब देखों ना, मिट्टी के दीयों के भाव भी आसमान छूने लगे हैं। ”
                                           
                                  _ सुरेश कुशवाहा ' तन्मय '
सबसे पहले गौर करने वाली बात यह है कि रचनाकार ने कितनी खूबसूरत तरीके और चुनिन्दा शब्दों के जरिये इतनी बड़ी बात कह दी । सही ही तो है , अगर वही दीये  किसी दुकान में पैकेट में 80 रु. के 6 प्राइस टैग के साथ बिकते तो बेशक खुशी-खुशी बिना मोल-भाव किए खरीद लेते । क्यों ? क्योंकि उसमें टैग लगा होता एम आर पी (MRP) का । यह बात सिर्फ़ दीयों तक सिमित नहीं । चलिए एक और उदाहरण लेते है , हमारे घर के नजदीकी बाजा़र में बैठे या हमारे घर के दरवाजे तक आने वाले सब्ज़ी या फल वाले भईया का । उनके पास से सब्ज़ी या फल खरीदते वक्त हमारी प्रतिक्रियाएं कुछ इस प्रकार होती हैं ~ अरे भईया ! बहुत मँहगा बता रहे है , सही रेट बताईये । यूँ कुछ 10 ~15 मिनट मोलभाव कर खरीददारी होती है परंतु वही सब्ज़ी या फल हम बिना मोलभाव के माॅल से ले आते है । वह भी उससे मँहगी कीमत पर । वहाँ क्यों नहीं मोलभाव किया जाता ?? कमी सिर्फ़ प्राइस टैग की ही तो है इन लोगों के पास । वस्तु एवं उत्पाद तो वही है ।
एक बात और है कि अब दीपावली पर माटी के दीये कम और मोमबत्तियाँ एवं रंग बिरंगी लाईट प्रचलन में ज्यादा है । स्वदेशी उत्पाद को छोड़ विदेशी के पीछे भागना और परंपरागत तरीकों को रौंदते हुए नए तरीके से त्योहार मनाना एक विचारणीय विषय है ।
               
                                  _ रुचि तिवारी

Sunday, October 28, 2018

अभी नवरात्रि को बीते सिर्फ़ .....

26 अक्टूबर 2018 तक नवरात्रि को बीते सिर्फ़ 7 दिन ही हुए थे । फिर भी नवरात्रि का उमंग लोगों में भरा हुआ है । 27 अक्टूबर 2018 को खबर आई कि शहडोल जिला के अमलाई थाना अंतर्गत रूगंठा नर्सरी स्कूल के समीप स्कूल जा रही कक्षा 8वीं की छात्रा के साथ उसी के मोहल्ले के रहवासी युवक ने घिनौनी वारदात को अंजाम दिया ।
अजीब है न , सिर्फ़ 8~10 दिन ही तो हुए हैं । अभी की ही तो बात थी पूरा देश नवरात्रि मना रहा था । हर कोई कन्यापूजन कर रहा था । हर एक युवक , युवतियाँ , बडे़ ~ बूढे़ सभी देवी माँ को प्रसन्न कर रहे थे । सभी बडे़ बडे़ वादे कर रहे थे। हर एक कन्या ~ लड़की को देवी माना जा रहा था । सब कुछ कितना जल्दी बिसर गया । भूला दिया जितनी भी पूजा-अर्चना , हवन किए , जितनी भी रक्षा के लिए कसमें ली थी , जितना खुद को पवित्र दर्शाया था। सच तो यह है कि वो सब सिर्फ़ दिखावा और ढकोसला था ।
यह मामला उजागर हुआ तो पता चल गया । हो सकता है ऐसी कितनी ही वारदातों को अब तक अंजाम दिया जा चुका हो जिनका पता ही न चला हो।
सच कहूँ तो इस बार नवरात्रि के समय में युवा शक्ति द्वारा नवरात्रि में बलात्कार के खिलाफ़ चलाई जा रही मुहिम , सोशल साइट की विभिन्न पोस्ट एवं स्टेट्स को ध्यान में रखते हुए ऐसी ही एक नई खबर के इंतजार में थी । भूल चूक मुझसे भी हुई हो सकती है कि इस घटना के पहले भी कोई खबर आई हो जिस तक मैं न पहुँच पाई हूँ ।
मामले की गहराई तक जाएँ तो पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार यह पता चलता है कि शुक्रवार की सुबह बालिका अपने नियमित समय पर स्कूल जा रही थी।इसी दौरान बालिका के घर के समीप रहने वाले युवक ने आकर बालिका को लिफ्ट देने के बहाने अपनी गाड़ी पर बैठाया । और बालिका को स्कूल न ले जाकर एक सूनसान स्थान पर ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया ।
बात अब यहाँ यह खड़ी हो जाती है कि  एक जमाना था जब बच्चों के लिए पूरा मोहल्ला या गाँव उनका घर कहलाता था । और अपने उस मोहल्ले में सुबह से शाम कब हो जाती थी पता ही नहीं चलता था । क्या इन सब में बालिका की गलती मानी जाए ? एक ओर यहाँ भी ध्यान जाता है कि कौन अब विश्वासपात्र है कौन नहीं ? हमेशा तो सीख यही दी जाती है कि अनजान व्यक्ति बुलाए तो पास नहीं जाना , अंजान व्यक्ति कुछ खाने को दे तो खाना नहीं , अंजानो से दूर रहना इत्यादि । पर अब जो ऐसे असमाजिक तत्व पैदा हो रहे है उनका क्या ? उस 13~14 साल की बालिका तो अपने पडो़स के रहने वाले भईया की बातों में आकर स्कूल जल्दी पहुँचने की आस लिये साथ चली गई । और गलती सिर्फ़ इतनी-सी थी कि उसे यह नही सिखाया गया था कि कुछ भी हो अपने सभी कार्यों को तुम स्वयं ही करना ।  कोई पहचान वाला हो या अंजान हो उसके पास या साथ मत आना जाना , एक दिन की किसी की मदद तुम पर ताउम्र उपकार का बोझ बनी रहेगी। जिस तरह रोज़ जाती हो उसी तरह जाना क्योंकि एक दिन का बदलाव बहुत बडा़ बदलाव साबित हो सकता है ।
                      _रुचि तिवारी
नोट : इस घटना पर लेखिका के निजी विचार हैं ।

Tuesday, October 16, 2018

ऐसा क्यों ??

' नवरात्रि ' देवी माँ का त्योहार ।
वो देवी माँ जिनको पूरी दुनिया उनकी अपार शक्ति के लिए याद करती है। घर में माँ ,बहन , बेटियाँ सभी पूजा अर्चना एवं उपवास करती है। साथ-साथ मातारानी से प्राथना करती हैं की माता अपनी शक्ति से हमारे घर की सारी विपदाओं को दूर कर हमारी रक्षा करना ।
     शक्ति का रूप मानी जाने वाली कन्याओं की पूजा भी की जाती है एवं उन्हें भोज भी कराया जाता है। उनमें माता की शक्ति विराजमान है ऐसा माना जाता है ।
तो सवाल यह उठता है कि ~ जबतक वह छोटी  होती है तो उसे शक्ति होने का एहसास कराया  जाता है , उसे  शक्ति का रूप माना जाता है परंतु जब उसकी उम्र वही शक्ति दिखाने कि होने लगती है तो उसे क्यों  दबाया जाता है ??
वह शक्ति है उसे जो़र से बोलने दो पर नहीं अपनी आवाज़ धीमी रखो यह कहा जाता है। वह शक्ति है खुद के  बाहरी काम स्वयं  कर सकती है उसे करने दो पर नहीं तुम अकेली  वह काम कैसे करोगी फलां (कोई पुरुष ) को साथ ले जाओ । वह शक्ति है उसे खुद के विरूद्ध कार्य होने पर बोलने दो पर नहीं तुम ज्यादा बहस मत करो लड़की जैसी रहो कहकर चुप  करा दिया जाता है।
                        ऐसा क्यों ???????
बात सिर्फ़ इतनी है कि जिसके लिए हम माँ जगदंबिका की पूजा अर्चना करते हैं और उन्हें जिसका प्रतीक मानते हैं वह सिर्फ़ उन तक सिमट कर न रह जाए। मूर्तिशक्ति के सामने खड़ी समस्त बेटियों , बहनों और माँ में वही शक्ति उस भक्ति के साथ आ जाए कि जब कोई दुराचारी दुष्कर्म करने की ठाने तब वह शक्ति अपनी शक्ति दिखा खुद का बचाव कर सके , अपने हक के लिए कोई भी लड़की , बहन ,बेटी , पत्नी निडर खड़ी हो सके और घरेलू हिंसा के प्रति हर नारी आवाज़ उठा सके । नारी शक्ति को उसकी असीम शक्ति का एहसास कराएँ ।
              " प्रतीक "को सिर्फ़ चिन्ह न रहने दो
              " शक्ति " को यूँ माटी में न घुलने दो
                पहचान खुद की खुद को करने दो
                चुप्पी तोड़ लफ्जों को बहने दो ।
#women_are_shakti

Friday, October 12, 2018

विथ हर : अ स्किल्ड गर्ल फोर्स

11 अक्टूबर एक ऐसा विशेष दिवस है, जो कि “अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस” के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है। दिसम्बर 2011 में यूएन ने 11 अक्टूबर 2012 से इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इस दिवस की स्थापना पर लिंग समानता पर 2030 तक काबू पाने का उद्देश्य निर्धारित किया गया।
हर वर्ष यह दिवस एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है, जिसका चयन महिला सशक्तिकरण को  केन्द्र में रखकर किया जाता है। वर्ष 2012 में पहले अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस की थीम की बात करे तो, उसकी थीम ” बाल विवाह की समाप्ति ” थी और हर वर्ष लगातार नई-नई थीम के साथ इस वर्ष 7वां अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस " विथ हर:अ स्किलड गर्ल फोर्स " थीम पर मनाया गया।
इस वर्ष इस थीम के चयन की वजह यह रही कि 10 प्रतिशत छोटी उम्र की बच्चियाँ आज भी स्कूल की छांव से काफी दूर है। वही किशोरियों मे कौशल की कमी देखने को मिल रही है जो कि सशक्तिकरण में एक बहुत बड़ा रोड़ा है।
उपाय :
यूएन (UN)की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की 600 मिलियन किशोरियों में हर एक में इतनी क्षमता, रचनात्मकता एवं शाक्ति है कि वे वैश्विक स्तर की इंडस्ट्री तच पहुंच सकती है। इसके लिए सबसे पहले समाज को कुछ पहल एवं आवश्यक कदम उठाने होगे।
जैसे कि-
* लिंग समानता एवं उसके प्रति प्रतिक्रिया एवं मानसिकता में बदलवा लना पड़ेगा।
* Science (विज्ञान), Technology (तकनीक), Engineering  (इंजीनियरिंग ) एवं Maths (गणित) STEM विषयों व क्षेत्रों में बालिकाओं को बढ़ावा देना।
* एक पहल स्कूलों, काॅलेज में किशोरियों को प्रक्टिकल नाॅलेज की ओर अग्रसर करना। जैसै कि : करियर मार्गदर्शन , इंटर्नशिप , आंत्रपेन्युरशिप आदि ।
* पब्लिक एवं प्राईवेट सेक्टर की तरफ रुझान।
इन जैसे कुछ कदमों को उठाकर हम बालिकाओं में आत्मविश्वास उत्पन्न कर सकते है।
आइए एक पहल करते है और इन बच्चियों को भविष्य़ में डाॅक्टर म, इंजीनियर, वकील, जज, आईएएस, टीचर ,पायलट , फ्रिलांसर , स्तंभकार आदि बनाने का संकल्प लेते है।
                  लेखिका- रूचि तिवारी
नोट- उपयुक्त लेख में विभिन स्त्रोतों से डाटा इक्कठा करके लेखिका ने अपने विचार पेश किये हैं ।

Monday, April 30, 2018

यूँ तो मैं नकारात्मक नहीं !!!

मीडिया  एक बहुत ही व्यापक क्षेत्र है जिससे कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है । व्यापार हो या राजनीति , खेल या  फैशन ~ ग्लैमर , शिक्षा हो या मनोरंजन चाहे फिर  क्यों ही हो  राशिफल हर एक टार्गेट रीडर्स(अॉडियंस) के समूह के लिए समूचा  जानकारियां इकट्ठा फर्ज है मीडिया का ।
                  मीडिया है ही जनता\समाज के लिए और जब जनता से फीडबैक लिया जाता है तो मीडिया के विषय  पर सबसे बड़ा सवाल यह  खड़ा कर दिया जाता है कि मीडिया में इतनी नकारात्मकता क्यों आ रही है । मैं नहीं मानतीं की मीडिया में सिर्फ नकारात्मक खबरों को ही दर्शाया जाता है । मीडिया का तात्पर्य अगर जनता सिर्फ टी.वी. या अखबार तक रखती है तो वह अभी तक जागरूक नहीं है । मीडिया की बहुत सारी शाखाएं हैं जिनमें अखबार और न्यूज चैनल के अलावा मैग्जीन, फिल्म, रेडियो  आदि आते है।
                बात शुरू हुई थी मीडिया में नकारात्मकता को लेकर । जाहिर है मीडिया वही दर्शाती है जो समाज में घटित होता है । इस कड़ी में मीडिया की शाखा फिल्म और धारावाहिक में थोड़ा अंतर हो जाता है क्योंकि वह काल्पनिकताओं को पंख देते हुए अपने संदेश की बखूबी उड़ान भरता है।
वहीं अमूमन लोगों के ज़हन में रहने वाली शाखा न्यूज़ चैनलों की बात की जाए तो वह वही दर्शा रहे हैं जो समाज में घटित हो रहा हैं । अगर समाज में नकारात्मक घटनाएँ  अधिक हो रहीं हैं तो स्वभावतः खबरें वहीं बनेगी और इन सबके बावजूद मीडिया समाज के सकारात्मक परिपेक्ष्य को दर्शाकर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहीं है।
         बात इतनी सी स्पष्ट करना चाह रहीं हूँ कि जहाँ अखबार और न्यूज़ चैनलों में ऐक्सिडेंट , रेप जैसी कई अन्य नकारात्मक न्यूज़ दिखाई जाती है तो वहीं किसानों की समस्याओं को उठाया जाता है , पानी की किल्लत भी दर्शाती है और मासूमों एवं बेगुनाहों की  आवाज को भी उठाया जाता है ।
   अब तो फिल्में भी सिर्फ़ मनोरंजन का साधन और काल्पनिकता की दुनिया नहीं रह गई । अब वहां दंगल, अकीरा, पिंक, टाॅयलेट, पैडमैन जैसी अनेक फिल्में है जो न सिर्फ़ जागरूक करती है  वरन आत्मविश्वास भी एक नई उर्जा के साथ उत्पन्न करती हैं ।
             समाज को ऐसी अनकही बात समझनी चाहिए जो कि बयां नहीं हो पा रही हैं ।

थैंक्यू KK! हम रहें या न रहें कल, कल याद आएंगे ये पल, प्यार के पल...

KK, 90's के दौर का वो नाम जिसकी आवाज सुन हम सभी बड़े हुए। 'कुछ करने की हो आस-आस... आशाएं' या 'अभी-अभी तो मिले हो, अभी न करो ...